लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
सत्याग्रह की नई परिभाषा: जब जनचेतना और लोकतांत्रिक संघर्ष ने अहंकार को झुकाया
"न्याय के संघर्ष की वह दास्तान, जहाँ सत्ता के गलियारों को जनता की दहलीज़ पर झुकना पड़ा'
राजनीति में जीत और हार के मायने सिर्फ चुनावी आंकड़ों तक सीमित नहीं होते। कई बार सत्ता की चौखट पर एक आम नागरिक की चीख और उस चीख को अपनी आवाज बना लेने वाले जननेता का संकल्प, इतिहास की धारा को मोड़ देता है। हाल ही में दिल्ली की सड़कों और संसद मार्ग थाने के बाहर जो कुछ घटा, वह केवल एक पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज होने भर की घटना नहीं है, बल्कि यह उस वैचारिक, संवैधानिक और लोकतांत्रिक जद्दोजहद का जीवंत दस्तावेज है, जहां क्रूर सत्ता के अहंकार को सत्याग्रह की नैतिक ताकत ने घुटनों पर ला दिया
## दमन और अमानवीयता की पराकाष्ठा: जंतर-मंतर का काला अध्याय
विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब देश का भविष्य कहे जाने वाले छात्र, पेपर लीक जैसी गंभीर व्यवस्थागत विफलताओं के खिलाफ शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे थे। एक लोकतांत्रिक देश में अपनी बात रखना नागरिकों का मौलिक अधिकार है, लेकिन सरकार ने संवाद का रास्ता चुनने के बजाय दमन का मार्ग अपनाया। वर्दीधारी पुलिस, अर्धसैनिक बल और सादे कपड़ों में छिपे अराजक तत्वों ने निहत्थे छात्रों पर जो बर्बरता दिखाई—कील-जड़ी लाठियां भांजी गईं, टीयर गैस और पैलेट गन का इस्तेमाल किया गया—उसने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया।
इसी क्रूरता का शिकार हुआ युवा साहिल, जिसके शरीर में पैलेट गन के दो सौ से अधिक छर्रे धंस गए और उसने अपनी आँखों की रोशनी हमेशा के लिए खो दी। 14 अगस्त से वह पीड़ित छात्र अपने माता-पिता के साथ न्याय की भीख मांगते हुए दिल्ली के थानों के चक्कर काट रहा था, लेकिन गृह मंत्रालय के प्रभाव वाली इस व्यवस्था में उसकी सुनने वाला कोई नहीं था।
## संसद से सड़क तक: गृह मंत्रालय की विफलता और जवाबदेही का शून्य
संसद के पटल पर इस अमानवीयता की गूंज सुनाई दी। जब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संसद में यह सवाल उठाया कि सरकार के अपने दावों के मुताबिक जब एक मिनट में एफआईआर दर्ज हो जानी चाहिए, तो इस मामले में साढ़े सात घंटे या हफ्तों का वक्त क्यों लग गया? जंतर-मंतर की बर्बरता के लिए सीधे गृहमंत्री की जवाबदेही तय करने की मांग उठी।
परिणामस्वरूप, देश ने एक अजीब राजनीतिक गतिरोध देखा जहाँ प्रधानमंत्री और गृहमंत्री अपनी ही संसद से कन्नी काटते नजर आए। जिस तंत्र को अजेय और चाणक्य नीति का प्रतीक बताया जाता था, वह जनता के सवालों के सामने असहाय और नतमस्तक दिखा। सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर देना इस बात का प्रमाण था कि सरकार के पास विपक्ष के तीखे और तार्किक सवालों का कोई जवाब नहीं था।
## सत्याग्रह की पुनरावृत्ति: जब थाने की चौखट पर झुका सत्ता का अहंकार
जब थाने के अधिकारियों ने पीड़ित साहिल की अर्जी लेने से इनकार कर दिया, तब राहुल गांधी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे केवल सियासी बयानबाजी करने वाले नेता नहीं, बल्कि संघर्ष की जमीन पर खड़े होने वाले जननेता हैं। वे सीधे उसी थाने पहुंचे और पीड़ित का हाथ थामकर बैठ गए।
* सत्याग्रह का संकल्प: थाने के भीतर राहुल गांधी का यह कहना कि "सरकार की कसम है एफआईआर न लिखने की, तो मेरी भी कसम है एफआईआर लिखवाए बिना यहाँ से न हिलने की," कांग्रेस पार्टी के ऐतिहासिक वैचारिक संघर्ष और महात्मा गांधी की सत्याग्रह परंपरा का आधुनिक संस्करण था।
* लोकतांत्रिक दबाव: जैसे-जैसे घंटे बीते, थाने के बाहर छात्रों, युवाओं और आम नागरिकों का हुजूम जुटने लगा। व्यवस्था की मनमानी के खिलाफ जनता का यह प्रखर विरोध इस बात का प्रतीक था कि लोकतंत्र में नागरिक की आवाज को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता।
घड़ी की सुइयों के साथ जब जनता का दबाव बढ़ा, तो अंततः उस क्रूर सत्ता को झुकना पड़ा। साहिल की शिकायत पर एफआईआर दर्ज हुई। यह जीत इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि जब तक जननेता और पीड़ित जनता कंधे से कंधا मिलाकर खड़े हैं, तब तक तानाशाही और अहंकार की दीवारें हिल कर रहेंगी।
## यह न्याय की मंजिल नहीं, संघर्ष की पहली सीढ़ी है
साहिल की एफआईआर दर्ज होना न्याय की अंतिम मंजिल नहीं है, बल्कि यह उस लंबी और कठिन लड़ाई की महज पहली सीढ़ी है, जहां आम आदमी को अपनी छोटी-सी गुहार के लिए भी दर-दर भटकना पड़ता है। यह घटना हमसे यह सवाल पूछने पर मजबूर करती है कि एक कल्याणकारी लोकतंत्र में न्याय की पहली दस्तक इतनी दुरूह और संघर्षपूर्ण क्यों हो जाती है?
राहुल गांधी ने 'भारत जोड़ो यात्रा' से लेकर देश के कोने-कोने में जाकर जिस तरह से किसानों, मजदूरों, छात्रों और वंचितों की पीड़ा को अपने गले लगाया है, उसने भारतीय राजनीति में एक नए जननेता की छवि गढ़ी है। यह जीत बताती है कि जनता के बीच जाकर उनके आंसुओं को अपनी ताकत बनाना ही वास्तविक राजनीति है। गोडसे की विचारधारा के पुजारियों को यह समझ लेना चाहिए कि वे भले ही सत्ता के तमाम तामझाम का इस्तेमाल कर लें, लेकिन गांधी के विचारों और न्याय के इस अडिग संघर्ष को कभी पराजित नहीं कर सकते।
आज का विचारणीय प्रश्न: "क्या हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक आम नागरिक को अपनी बुनियादी न्याय की गुहार लगाने के लिए हर बार किसी बड़े राजनीतिक संघर्ष या सत्याग्रह का ही सहारा लेना पड़ेगा?"
