लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
राष्ट्र, विचार और व्यवस्था: देशहित के परिप्रेक्ष्य में वैचारिक विमर्श
किसी भी जीवंत और प्रगतिशील लोकतंत्र में 'राष्ट्रहित' सबसे सर्वोपरि और संवेदनशील विषय होता है। समय-समय पर समकालीन राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में ऐसी शब्दावलियाँ उभरती हैं जो वैचारिक लड़ाइयों का केंद्र बन जाती हैं। इनमें 'कुर्सीजीवी नक्सली' और 'दिमागी नक्सली' जैसी प्रवृत्तियाँ आज के राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हैं। हालांकि ये दोनों शब्द प्रशासनिक या कानूनी परिभाषाओं का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक विश्लेषण और वैचारिक आलोचना के उपकरण हैं, परंतु देश के लिए इनके निहितार्थ और प्रभाव बेहद गंभीर हैं।
इस वैचारिक विमर्श में यह समझना आवश्यक है कि राष्ट्र के लिए वास्तविक खतरा किसी एक नारे या विशेष उपाधि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन आचरणों और प्रवृत्तियों में निहित है जो संवैधानिक मूल्यों और जनहित को ठेस पहुँचाते हैं।
१. वैचारिक और व्यावहारिक धरातल पर दोनों प्रवृत्तियों का विश्लेषण
क. 'कुर्सीजीवी नक्सली': सत्ता और अवसरवाद का अंतर्विरोध
यह शब्दावली उस विरोधाभास की ओर संकेत करती है जहाँ संवैधानिक पदों, प्रशासनिक व्यवस्था या सत्ता के प्रभावशाली दायरों में बैठे लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ऐसी ताकतों को संरक्षण देते हैं जो राज्य की संप्रभुता को चुनौती देती हैं।
निहितार्थ: जब कोई व्यक्ति या समूह व्यक्तिगत या दलीय राजनीतिक लाभ के लिए राष्ट्र विरोधी तत्वों, अराजकता या हिंसा को नजरअंदाज करता है या उसका राजनीतिक उपयोग करता है, तो इसे व्यवस्था के भीतर का सबसे बड़ा जोखिम माना जाता है।
प्रभाव: यह प्रवृत्ति लोकतंत्र की रीढ़—पारदर्शिता और कानून के शासन—को अंदर से दीमक की तरह खोखला करती है। इसमें खतरा केवल बाहरी नहीं, बल्कि रक्षक के ही भक्षक बन जाने की आशंका का होता है।
ख. 'दिमागी नक्सली': वैचारिक कट्टरता और बौद्धिक विच्छेदन
यह शब्द उन बुद्धिजीवियों, विचारकों या प्रभावक समूहों के लिए प्रयोग किया जाता है जो प्रत्यक्ष रूप से हिंसक गतिविधियों में शामिल नहीं होते, परंतु बौद्धिक और वैचारिक मंचों से ऐसी सोच को बढ़ावा देते हैं जो समाज में विभाजन, वैमनस्य और संवैधानिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करती है।
निहितार्थ: इसमें विचारों के जरिए लोकतांत्रिक संस्थाओं, न्यायपालिका और राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति अनादर की भावना बोई जाती है। आलोचकों के अनुसार, यह एक प्रकार का बौद्धिक अतिवाद है जो युवाओं और समाज के एक बड़े वर्ग की सोच को भटकाने का काम करता है।
प्रभाव: जब विचार संवाद और सुधार के बजाय विघटन और नफरत का हथियार बन जाते हैं, तो वे समाज की सामूहिक चेतना और राष्ट्र की सांस्कृतिक व सामाजिक एकता को आघात पहुँचाते हैं।
२. वास्तव में देश का अहित किसके द्वारा हुआ या हो रहा है?
जब हम इस बात पर गहराई से विचार करते हैं कि वास्तव में देश का अहित किसके द्वारा हुआ या हो रहा है, तो इसका उत्तर किसी एक व्यक्ति, दल या विशेष विचारधारा तक सीमित नहीं है। इतिहास और वर्तमान के अनुभवों के आधार पर, देश को नुकसान पहुँचाने वाली ताकतों और प्रवृत्तियों को निम्नलिखित रूपों में स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है:
वह नेतृत्व और प्रशासनिक वर्ग, जिसने स्वार्थ को राष्ट्रोपरि रखा: देश का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष अहित उन ताकतों और व्यक्तियों द्वारा हुआ है जिन्होंने संवैधानिक पदों पर रहते हुए भी राष्ट्रहित की बजाय व्यक्तिगत, पारिवारिक, दलीय या वैचारिक स्वार्थ को प्राथमिकता दी। जब शासन-प्रशासन में बैठे लोग संसाधनों का दुरुपयोग करते हैं या भ्रष्टाचार को संरक्षण देते हैं, और सत्ता प्राप्ति के लिए समाज को जातियों, धर्मों और क्षेत्रों में बांटने की राजनीति करते हैं, तब देश की एकता को सबसे गहरा आघात पहुँचता है।
वह चरमपंथी और हिंसक सोच, जिसने देश की संप्रभुता को चुनौती दी: चाहे वह सशस्त्र नक्सलवाद हो, उग्रवाद हो या आतंकवाद, इन सभी ने देश के नागरिकों और सुरक्षा बलों के खून से अपनी जमीन सींची है। इन हिंसक गतिविधियों के कारण देश के पिछड़े इलाकों में बुनियादी विकास नहीं पहुँच पाया, और हथियार उठाकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की कोशिश करने वाले तत्व सीधे तौर पर देश की संप्रभुता और संविधान के दुश्मन रहे हैं।
वह वैचारिक और बौद्धिक वर्ग, जिसने भ्रम और विभाजन फैलाया: प्रत्यक्ष रूप से हथियार न उठाने के बावजूद, देश का अहित उन लोगों द्वारा भी हुआ है जिन्होंने अपने बौद्धिक प्रभाव का इस्तेमाल समाज में अविश्वास, नफरत और भ्रम फैलाने के लिए किया। जब कुछ लोग अपने वैचारिक चश्मे से देखकर राष्ट्र विरोधी कृतियों पर या तो मौन साध लेते हैं या उनका समर्थन करते हैं, तो यह समाज की नैतिक चेतना को कमजोर करता है।
३. देश हित के लिए सबसे हानिकारक मूल प्रवृत्तियाँ
यदि इन सबका निचोड़ निकाला जाए, तो राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा खतरा किसी एक विशेष वैचारिक या राजनीतिक ठप्पे में नहीं, बल्कि उन मूल विकृतियों में छिपा है जो समाज को कमजोर करती हैं:
हिंसा और असहिष्णुता का समर्थन: साधन कोई भी हो—चाहे वह भौतिक हथियार हो या वैचारिक घृणा—यदि उसका उद्देश्य राज्य की संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करना है, तो वह राष्ट्रहित के विरुद्ध है।
संविधान सर्वोपरि के सिद्धांत से समझौता: जब राष्ट्रहित को छोड़कर दलगत राजनीति, वैचारिक अहंकार या व्यक्तिगत स्वार्थ को प्राथमिकता दी जाती है, तब देश का वास्तविक नुकसान होता है।
संवादहीनता और अविश्वास का वातावरण: लोकतंत्र की ताकत आपसी संवाद और बहुरूपता में है। जब वैचारिक असहमतियों को राष्ट्रद्रोह का रूप दे दिया जाए या राष्ट्र विरोधी ताकतों को बौद्धिक स्वतंत्रता की आड़ में वैधता दी जाए, दोनों ही स्थितियां समाज के संतुलन को बिगाड़ती हैं।
अंततः, देश के लिए सबसे बड़ा संकट वह आचरण है जो संविधान की मर्यादाओं, नागरिकों के अधिकारों और राष्ट्र की अखंडता से ऊपर अपने वैचारिक या राजनीतिक हितों को रखता है। राष्ट्रहित की रक्षा के लिए यह आवश्यक है कि लोकतंत्र के प्रहरी—चाहे वे सत्ता में हों या बौद्धिक मंचों पर—जिम्मेदारी, पारदर्शिता और अटूट राष्ट्रनिष्ठा का परिचय दें।
जब कोई राजनेता कुर्सी के लिए देश की कीमत चुकाता है, जब कोई बंदूकधारी विकास के रास्ते में गोलियां चलाता है, और जब कोई विचारक कलम से समाज के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करता है—ये सभी अलग-अलग मोर्चों पर देश के अहित के जिम्मेदार रहे हैं। असली खतरा शब्दों के चयन में नहीं, बल्कि उस नीयत और कार्यशैली में है जो देश को जोड़ने के बजाय विभाजित करने का प्रयास करती है।
