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वैचारिक विमर्श: 'जन गण मन' बनाम 'वंदे मातरम' - इतिहास, भ्रातियां और राष्ट्र का सांस्कृतिक मिजाज

 

वैचारिक विमर्श: 'जन गण मन' बनाम 'वंदे मातरम' - इतिहास, भ्रातियां और राष्ट्र का सांस्कृतिक मिजाज

## राष्ट्रगान का सच, इतिहास का आईना और वैचारिक भ्रांतियों का अंत

अभिनेता मुकेश खन्ना के हालिया बयान ने एक बार फिर उस पुरानी और बार-बार उठने वाली बहस को हवा दे दी है, जो पिछले एक सदी से हमारे राष्ट्रीय मानस में समय-समय पर उबाल लाती रही है। उनका यह दावा कि भारत का राष्ट्रगान 'जन गण मन' नहीं बल्कि 'वंदे मातरम' होना चाहिए—और यह कि 'जन गण मन' ब्रिटिश राजशाही के सम्मान में लिखा गया था—कोई नई बात नहीं है। यह एक ऐसा भ्रम है जिसे राजनीतिक सुविधा और ऐतिहासिक सत्यों की अज्ञानता के चलते बार-बार पुनर्जीवित किया जाता है। आज जब हम इस विवाद के तह में जाते हैं, तो इतिहास के पन्ने खुद गवाही देते हैं कि यह पूरा नैरेटिव तथ्यात्मक रूप से भ्रामक और वैचारिक रूप से रीता है।

## ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विवाद की जड़ें

इस कथित विवाद की शुरुआत 1911 से जुड़ती है, जब ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम भारत आए थे और उसी वर्ष दिसंबर में कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ था। 27 दिसंबर 1911 को उस अधिवेशन में पहली बार 'भारतो भाग्य विधाता' गीत गाया गया, जो आगे चलकर 'जन गण मन' के रूप में स्थापित हुआ।

चूंकि राजा की यात्रा और गीत का पहला सार्वजनिक गायन लगभग एक ही समय हुआ था, इसलिए उस दौर के कुछ चापलूस अंग्रेजी अखबारों ने यह खबर फैला दी कि यह गीत ब्रिटिश किंग के स्वागत में लिखा गया था। हालांकि, उस समय किसी ने इस पर गंभीर ध्यान नहीं दिया, लेकिन असली वैचारिक टकराहट 1930 के दशक में शुरू हुई।

1937 के प्रांतीय चुनावों के बाद जब कांग्रेस की सरकारें बनीं, तो यह सवाल उठा कि आधिकारिक कार्यक्रमों में कौन-सा गीत गाया जाए। यहीं से 'वंदे मातरम् बनाम जन-गण-मन' की बहस ने जन्म लिया।

 वंदे मातरम की महत्ता: बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित और उनके उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा रहा यह गीत 1905 के बंग-भंग आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता संग्राम की पहचान बन चुका था। क्रांतिकारी इसी को गाकर फांसी के फंदे पर झूलते थे।

 सांस्कृतिक आपत्तियां: इस गीत के बाद के अंतराओं में भारत माता को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में चित्रित किए जाने के कारण मुस्लिम लीग और अन्य संगठनों ने इस पर आपत्तियां उठाईं, जिसके बाद संतुलन साधने के लिए 'जन गण मन' को प्राथमिकता मिलने लगी।

## रवींद्रनाथ टैगोर का स्पष्टीकरण और उनका चरित्र

जब यह विवाद तूल पकड़ने लगा, तब खुद गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने आगे आकर इसका खंडन किया। 1937 में अपने मित्र पुलिन बिहारी सेन को लिखे पत्र और 1939 के अपने सख्त बयानों में उन्होंने साफ किया कि उनके गीत का 'भाग्य विधाता' कोई जॉर्ज पंचम नहीं, बल्कि भारत की आम जनता है। उन्होंने दो टूक कहा था कि यह सोचना भी उनकी समझ का अपमान है कि वे ब्रिटिश सम्राट की प्रशंसा में कोई गीत लिख सकते हैं।

इसके अलावा, टैगोर के व्यक्तित्व को समझने के लिए उनके कृत्यों को देखना जरूरी है:

 'सर' की उपाधि का त्याग: 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद टैगोर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई 'नाइटहुड' (सर) की उपाधि यह कहते हुए लौटा दी थी कि क्रूरता के साये में सरकारी सम्मान पाना शर्मनाक है।

 वैश्विक स्वीकार्यता: वे एशिया के पहले व्यक्ति थे जिन्हें "गीतांजलि" के लिए 1911-1913 के दौर में साहित्य का नोबेल मिला। अल्बर्ट आइंस्टीन से लेकर डब्ल्यू. बी. यीट्स तक, दुनिया के मनीषी उनकी बौद्धिक और आध्यात्मिक गहराई के कायल थे।

## संविधान सभा का विवेक और नेताजी का दृष्टिकोण

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इस लंबी बहस का ऐतिहासिक अंत किया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि 'जन गण मन' भारत का राष्ट्रगान होगा, जबकि 'वंदे मातरम' को उसकी अतुलनीय ऐतिहासिक भूमिका के कारण बराबर सम्मान देते हुए राष्ट्रगीत का दर्जा दिया जाएगा। यह निर्णय राष्ट्र की बहुलता और वैचारिक परिपक्वता का परिचायक था।

इस संदर्भ में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का रुख सबसे अधिक प्रासंगिक है। 1943 में नेताजी की आजाद हिंद सरकार ने 'शुभ सुख चैन' को अपना राष्ट्रगान बनाया था, जिसकी धुन भी टैगोर की रचना 'भारतो भाग्य विधाता' पर ही आधारित थी। यदि सुभाष चंद्र बोस जैसे कट्टर और असंदिग्ध राष्ट्रवादी को इस रचना में गुलामी की बू नहीं आई, तो आज के राजनीतिक विमर्श में इसे अंग्रेजों की चरण-वंदना बताना या तो ऐतिहासिक अज्ञानता है या फिर राजनीतिक स्वार्थ।

राष्ट्र प्रतीक हमारे साझा संघर्ष और अस्मिता के प्रतीक हैं। 'वंदे मातरम' हमारी सांस्कृतिक क्रांति की ऊर्जा है, तो 'जन गण मन' हमारे संविधान और लोकतांत्रिक राष्ट्र की सामूहिक चेतना का गान है। दोनों में कोई विरोध नहीं, बल्कि एक पूरकता है। इतिहास को अपने संकीर्ण राजनीतिक एजेंडे के चश्मे से देखना बंद किया जाना चाहिए, क्योंकि जो राष्ट्र अपने इतिहास के सत्य को झुठलाता है, वह भविष्य के निर्माण में कभी भ्रममुक्त नहीं हो सकता।

आज का विचारणीय प्रश्न: "क्या आधुनिक राजनीतिक लाभ के लिए ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करना हमारे राष्ट्रीय प्रतीकों और स्वाधीनता सेनानियों के बलिदान के साथ अन्याय नहीं है?"

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