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राष्ट्रहित, संविधान और नारी अस्मिता का अंतर्संबंध: जमुई की घटना पर एक गंभीर वैचारिक विमर्श.

 लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला 

राष्ट्रहित, संविधान और नारी अस्मिता का अंतर्संबंध: जमुई की घटना पर एक गंभीर वैचारिक विमर्श

"महिला अस्मिता और सुरक्षा केवल राजनीतिक लाभ-हानि का गणित नहीं, बल्कि किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक राष्ट्र की अंतरात्मा की जीवंत कसौटी है।"

भारत में महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और स्वाभिमान का प्रश्न आज एक ऐसे चौराहे पर आ खड़ा है जहाँ राजनीतिक संवेदनहीनता, सामाजिक पितृसत्तात्मक जकड़न और वैधानिक खोखलापन मिलकर आधी आबादी के अस्तित्व को गंभीर संकट में डाल रहे हैं। हाल ही में बिहार के जमुई जिले में हुई शर्मनाक घटना—जहाँ शाम के समय एक नाबालिग लड़की और लड़के को रोककर अभद्रता की गई, लड़की के साथ शारीरिक दुर्व्यवहार किया गया और उसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अश्लील गानों के साथ वायरल किया गया—यह केवल एक आपराधिक वारदात नहीं है, बल्कि संपूर्ण सामाजिक ताने-बाने और प्रशासनिक व्यवस्था के पराभव का जीवंत प्रमाण है।

इस घटना के बाद राजनीतिक दलों द्वारा की जाने वाली बयानबाजी, विशेषकर सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों द्वारा इसे 'मॉरल पुलिसिंग' या 'छिटपुट घटना' करार देना, इस बात की तस्दीक करता है कि हमारे नीति-निर्माताओं के लिए महिला सुरक्षा अभी भी मानवीय संवेदना का विषय न बनकर दलीय राजनीति का फुटबॉल मात्र बन चुकी है।

# विभिन्न परिप्रेक्ष्यों में गहन तथ्यात्मक और विश्लेषणात्मक मूल्यांकन

 संवैधानिक परिप्रेक्ष्य: भारत का संविधान अपने प्रत्येक नागरिक को अनुच्छेद 21 के तहत प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार और अनुच्छेद 14 के तहत विधि के समक्ष समता का अधिकार प्रदान करता है। इसके साथ ही अनुच्छेद 15(3) राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष उपबंध बनाने की शक्ति देता है। जमुई और मणिपुर जैसी घटनाएं संविधान की इन मूल भावनाओं और मौलिक अधिकारों की सरेआम धज्जियां उड़ाती हैं, जहाँ राज्य अपने नागरिकों को न्यूनतम सुरक्षा देने में भी असमर्थ साबित होता है।

 विधिक एवं न्यायिक परिप्रेक्ष्य: भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पॉक्सो (POCSO) अधिनियम जैसे कड़े कानून होने के बावजूद ज़मीनी स्तर पर इनका क्रियान्वयन लचर बना हुआ है। केवल त्वरित एनकाउंटर या सतही गिरफ्तारियां न्याय का पर्याय नहीं हो सकतीं। जब तक फास्ट ट्रैक अदालतों के माध्यम से मामलों का निस्तारण और अपराधियों को कड़ा दंड नहीं मिलता, तब तक न्याय अधूरा रहता है। इसके अलावा, साइबर अपराध कानूनों के तहत आपत्तिजनक वीडियो वायरल करने वालों पर कठोर कार्रवाई का अभाव कानून की कमज़ोरी को दर्शाता है।

 लोकतांत्रिक एवं जनहित परिप्रेक्ष्य: एक स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका जनता के मुद्दों को उठाना और सत्ता पक्ष को जवाबदेह बनाना है। राहुल गांधी द्वारा इस मामले में पॉक्सो के तहत सख्त कार्रवाई की मांग करना जनहित की आवाज़ को बुलंद करना है। इसके विपरीत, सत्ता में बैठे नेताओं द्वारा ऐसी घटनाओं को 'छिटपुट' बताना या 'मॉरल पुलिसिंग' की आड़ में अपराधियों का बचाव करना लोकतांत्रिक मूल्यों, उत्तरदायित्व और राजधर्म का खुला उल्लंघन है।

 सामाजिक एवं राष्ट्रहित परिप्रेक्ष्य: आधी आबादी को भयमुक्त वातावरण दिए बिना कोई भी राष्ट्र महाशक्ति बनने का सपना पूरा नहीं कर सकता। महिलाओं के खिलाफ हिंसा सीधे तौर पर राष्ट्रहित को कमज़ोर करती है। जब तक समाज में गहराई तक समाई पितृसत्तात्मक मानसिकता और महिलाओं को नियंत्रित करने की कुप्रथा को समाप्त नहीं किया जाता, तब तक कानून अकेले समाज को नहीं बदल सकते।

 निष्कर्ष और आगे की राह

जमुई की घटना से उपजा यह आक्रोश सिर्फ एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस संपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ है जो अपराधियों को संरक्षण देती है और पीड़ितों के घावों पर नमक छिड़कती है। मीडिया की निष्पक्ष भूमिका, न्यायपालिका की तत्परता और समाज की वैचारिक क्रांति के बिना महिला सुरक्षा के दावे हमेशा खोखले साबित होंगे।

"जब तक हर बेटी बिना किसी भय के आधी रात को नहीं, बल्कि दिन के उजाले में भी अपनी सड़कों पर सुरक्षित चलने का अधिकार प्राप्त नहीं कर लेती, तब तक तमाम विकास के दावे और महिला सशक्तीकरण के नारे केवल कागज़ी और बेमानी ही रहेंगे।"

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