‘बेटी बचाओ’ के नारों से आगे: सुरक्षा, सम्मान और न्याय पर उठते सवाल
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ पिछले एक दशक से अधिक समय से देश के सार्वजनिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। इस अभियान का उद्देश्य बालिकाओं की सुरक्षा, शिक्षा और सशक्तिकरण को बढ़ावा देना रहा है। लेकिन किसी भी सामाजिक अभियान की वास्तविक सफलता उसके नारों से नहीं, बल्कि आम नागरिक के अनुभव और जमीन पर दिखाई देने वाले बदलाव से तय होती है।
आज जब देश की युवा पीढ़ी, खासकर Gen-Z, सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के जरिए देश-दुनिया की घटनाओं को बेहद करीब से देख रही है, तब महिलाओं की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था को लेकर उसके सवाल भी अधिक मुखर हुए हैं। दिल्ली, बिहार और देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आने वाली महिलाओं के खिलाफ अपराध की घटनाएं समाज और व्यवस्था दोनों के सामने गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।
नारे और जमीन के बीच की दूरी
महिला सशक्तिकरण केवल योजनाओं, अभियानों और सरकारी विज्ञापनों तक सीमित नहीं हो सकता। किसी बेटी का सुरक्षित स्कूल जाना, नौकरी करना, सार्वजनिक स्थानों पर बिना भय के चलना और अपनी शिकायत पर समयबद्ध न्याय पाना ही वास्तविक सशक्तिकरण की कसौटी है।
जब किसी महिला के साथ अपराध होता है, तब सवाल केवल अपराधी की पहचान का नहीं होता, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होता है कि पुलिस कितनी तेजी से कार्रवाई करती है, जांच कितनी निष्पक्ष होती है और पीड़िता को न्याय कितने समय में मिलता है।
यही वह बिंदु है जहां सरकारी दावों और नागरिक अनुभवों के बीच अंतर दिखाई देने पर समाज सवाल पूछता है।
Gen-Z के सवाल केवल रोजगार तक सीमित नहीं
आज की युवा पीढ़ी पहले की तुलना में कहीं अधिक सूचनासंपन्न है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने उसे घटनाओं पर तत्काल प्रतिक्रिया देने और सवाल उठाने का मंच दिया है।
युवा यह जानना चाहता है कि कानून सभी के लिए समान रूप से लागू होता है या नहीं। वह यह भी पूछता है कि किसी प्रभावशाली व्यक्ति पर आरोप लगने और किसी सामान्य नागरिक पर आरोप लगने की स्थिति में जांच और कार्रवाई की गति समान क्यों नहीं दिखाई देती।
इन सवालों को केवल राजनीतिक नाराजगी कहकर खारिज करना समस्या का समाधान नहीं है। लोकतंत्र में सवाल पूछना नागरिक अधिकार और जवाबदेही का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
संविधान की कसौटी पर व्यवस्था
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की बात करता है, जबकि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा से जुड़ा है। इन संवैधानिक मूल्यों की वास्तविक परीक्षा तब होती है जब कोई नागरिक अपराध का शिकार बनता है और न्याय की व्यवस्था से सहायता की उम्मीद करता है।
न्याय में देरी, जांच में खामियां या पीड़ित की शिकायत को गंभीरता से न लिया जाना केवल किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं है। इससे संस्थाओं पर जनता का भरोसा प्रभावित हो सकता है।
इसलिए आवश्यकता केवल कठोर कानूनों की नहीं, बल्कि उनके निष्पक्ष र प्रभावी क्रियान्वयन की भी है।
अपराध को राजनीति के चश्मे से देखना कितना उचित?
महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में सबसे गंभीर समस्या तब पैदा होती है, जब घटना को अपराध के बजाय राजनीतिक पहचान के आधार पर देखा जाने लगे।
यदि आरोपी किसी एक राजनीतिक दल से जुड़ा हो तो एक तरह की प्रतिक्रिया और दूसरे दल से जुड़ा हो तो दूसरी प्रतिक्रिया—यह प्रवृत्ति समाज में न्याय की धारणा को कमजोर कर सकती है।
अपराध का विरोध व्यक्ति, दल या विचारधारा देखकर नहीं होना चाहिए। पीड़ित की पहचान से अधिक महत्वपूर्ण उसका अधिकार और आरोपी की राजनीतिक पहचान से अधिक महत्वपूर्ण कानून की प्रक्रिया होनी चाहिए।
अब नारों से आगे बढ़ने का समय
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियानों का उद्देश्य तभी सार्थक होगा जब उनका प्रभाव समाज के सामान्य जीवन में दिखाई दे। बेटियों की सुरक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है; परिवार, समाज, पुलिस, न्यायपालिका, शिक्षण संस्थानों और नागरिकों—सभी की साझा जिम्मेदारी है।
Gen-Z जिस भारत को देखना चाहती है, उसमें सुरक्षा किसी विशेष वर्ग की सुविधा नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक का अधिकार हो। वहां शिकायत दर्ज कराने के लिए रसूख की जरूरत न पड़े, न्याय के लिए वर्षों तक संघर्ष न करना पड़े और अपराध को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय कानून के अनुसार कार्रवाई हो।
राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल आर्थिक विकास, बड़ी परियोजनाओं या नारों में नहीं, बल्कि इस बात में भी दिखाई देती है कि उसकी बेटियां कितनी सुरक्षित हैं और नागरिकों को न्याय व्यवस्था पर कितना भरोसा है।
इसलिए आज जरूरत किसी एक दल या सरकार पर सवाल खड़ा करने से आगे बढ़कर उस व्यवस्था से सवाल पूछने की है, जिसकी जिम्मेदारी हर नागरिक के अधिकार, सम्मान और सुरक्षा की रक्षा करना है। यही लोकतांत्रिक आत्ममंथन है और यही सामाजिक बदलाव की पहली शर्त भी।
