लखनऊ डेस्क प्रदीप शुक्ला
'दिमागी नक्सल' का नया नैरेटिव और लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार
सुरक्षा की परिभाषा से बौद्धिक घेराबंदी तक
समय के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक विमर्श को प्रभावित करने वाली शब्दावली में निरंतर बदलाव आया है। एक दौर था जब सुरक्षा एजेंसियों की शब्दावली में 'नक्सल' शब्द का दायरा जंगलों और भौगोलिक सीमाओं तक सीमित था। इसके बाद वैचारिक और अकादमिक जगत में 'अर्बन नक्सल' (Urban Naxal) की अवधारणा ने प्रवेश किया, जिसके तहत विश्वविद्यालयों, सेमिनारों और साहित्यिक बहसों को दायरे में लाने का प्रयास किया गया। राजनीतिक गलियारों से लेकर मीडिया तक 'टुकड़े-टुकड़े गैंग', 'खान मार्केट गैंग' और 'आंदोलनजीवी' जैसे विशेषणों की खोज ने इस शब्दावली को और विस्तृत किया।
अब यह वैचारिक दायरा और आगे बढ़कर सीधे नागरिक की 'खोपड़ी के भीतर' यानी उसके व्यक्तिगत चिंतन और तार्किक क्षमता तक पहुंच गया है। सत्ता के गलियारों से लेकर सार्वजनिक मंचों तक 'दिमागी नक्सल' (Brain Naxalism) जैसे नए शब्दों का प्रयोग इस बात का संकेत है कि अब असहमति या सवाल पूछने की प्रवृत्ति को किस दृष्टि से देखा जा रहा है।
तार्किक विमर्श: जिज्ञासा बनाम संदिग्धता
इस नई शब्दावली के दायरे में यदि सैद्धांतिक प्रक्रिया को देखें, तो नागरिकों की सामान्य प्रशासनिक जिज्ञासाओं को भी संशय की नजर से देखा जाने लगा है:
सवालों का दायरा: बेरोजगारी, मुद्रास्फीति (रुपये की गिरावट), पेपर लीक और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दे जब एक सामान्य नागरिक के मन में उठते हैं, तो उन्हें वैचारिक विचलन के रूप में चिन्हित किया जाने लगता है।
दिमाग की स्वाभाविक प्रवृत्ति: लेखक के तर्कों के अनुसार, मानवीय मस्तिष्क की फितरत ही ऐसी है कि वह प्रस्तुत किए गए आंकड़ों (जैसे जीडीपी के मुकाबले प्रति व्यक्ति आय या एक्सप्रेसवे के बरक्स टूटी सड़कों का हिसाब) का विश्लेषण करना चाहता है।
नीतियों और दावों की समीक्षा: जब विकास के दावों, विश्वगुरु की अवधारणा या भविष्य के लक्ष्यों के बीच ज़मीनी हकीकत पर सवाल पूछे जाते हैं, तो उसे असहमत या व्यवस्था विरोधी मान लिया जाता है।
लोकतंत्र, मीडिया और शिक्षा का बदलता स्वरूप
इस वैचारिक बदलाव का असर सार्वजनिक संस्थानों, शिक्षा और पत्रकारिता पर भी स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है:
1. शिक्षा और सहमति: विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में आलोचनात्मक चिंतन (Critical Thinking) के स्थान पर प्रशासनिक निर्णयों की स्वीकार्यता को प्राथमिकता देने वाले नए पाठ्यक्रम या 'सहमति अध्ययन' जैसे विषयों की कल्पना की जाने लगी है। परीक्षा प्रणाली में भी बहुविकल्पीय माध्यमों से यह सुनिश्चित करने का प्रयास होता है कि उत्तर केवल सत्ता के अनुकूल हों।
2. पत्रकारिता की भूमिका: चौथे स्तंभ के रूप में स्थापित पत्रकारिता का कार्य जनता के कठिन प्रश्नों को सरकार तक पहुंचाना माना जाता था। किंतु इस नए विमर्श में पत्रकारिता का स्वरूप बदलकर सत्ता के कार्यों की सराहना या आसान विषयों तक सीमित होने की ओर अग्रसर प्रतीत होता है।
3. विचारों की संक्रामकता: विचारों और तर्कों की यह विशेषता रही है कि उन्हें किसी एक सीमा या जेल में कैद नहीं किया जा सकता। प्रतिबंधों के बावजूद पुस्तकें, पीडीएफ, डिजिटल स्क्रीनशॉट और सवाल किसी न किसी रूप में अपनी जगह बना ही लेते हैं।
नागरिक और सत्ता का संबंध
इस प्रकार, लोकतंत्र के इस नए संस्करण में नागरिकों के समक्ष यह असमंजस खड़ा हो गया है कि वह अपनी तार्किक क्षमता का उपयोग किस सीमा तक करें। एक तरफ जहाँ लोकतांत्रिक व्यवस्था में सवाल पूछना और हिसाब मांगना नागरिक का मौलिक अधिकार माना जाता है, वहीं दूसरी तरफ ऐसे प्रश्नों को 'दिमागी नक्सल' करार देने की प्रवृत्ति समाज को दो श्रेणियों में विभाजित करती है—एक जो हर स्थिति में सहमति जताता है, और दूसरा जिसके मन में व्यवस्था को लेकर वैचारिक जिज्ञासाएं बनी रहती हैं। यह विमर्श अंततः इस बात पर विचार करने के लिए बाध्य करता है कि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए असहमति और संवाद कितना अनिवार्य है।
